लिखने की तिथी - 29-30/08/1976
बहुत आसान है -
गुनगुनाना किसी छायादार पेड़ के तले।
उतना ही आसान है –
किसी सभा या सम्मेलन में -
भाषण देना भी।
‘पर’ दोष देखना भी है बहुत सरल,
‘पर’ उपदेश भी कुशल बहुतेरे,
कठिन बस केवल –
अपने से अपनी पहचान करानी।
तुम्हारी तो तुम जानो –
मैने जब-जब भी स्वयं को
सत्य की कसौटी पर तोलना चाहा,
स्वयं को स्वयं से ही अजनबी पाया।
बहुत खूब
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