इस ब्लॉग में पिता जी की कुछ बहुत पुरानी रचनाओं को प्रस्तुत करूंगा।
आज की कविता -
लिखने की तिथी 2-9/9/1976
माना आगए हैं आज हम भी वहां
जहां मानवता है और न ही मानव
हमारे चारों ओर ही रचे जा रहे हैं
अनगिनत षडयन्त्र
तभी तो संस्कार नाम की चिड़िया
अपने सुनहरी पंखों सहित उड़ गई है
और हम भी इन जानवरों की भीड़ में
देखा - देखी
कर बैठे हैं सब कुछ विस्मृत
हां एक एहसास सा होता है ---
हम कभी मानव थे
क्या थे कैसे थे छुप गया है
अतीत के गर्भ में
फिर भी आओ
जानवरों की भीड़ से
अलग हटकर
मानव और मानवता की ओर बढ़ें
ठीक ठीक न सही
मानव सी कुछ मिलती जुलती मुर्तियां गढ़ें
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(इसके बाद की चार पंक्तियो पर गोला लगा दिया है .... वे पंक्तियां हैं -
बापू के थे तीन आदर्श बन्दर
हम भी तीनों बच्चों को आदर्श बनाएं
संभव है कल को ये ही कहीं से
ले आएं ढूंढ कर खोई मानवता
शायद इसी लिए यह चित्र खिंचवाया होगा -
बीच में मैं हूं और आसपास दोनों भाई हैं।)