शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

अजनबी

लिखने की तिथी - 29-30/08/1976

बहुत आसान है -
गुनगुनाना किसी छायादार पेड़ के तले।
उतना ही आसान है –
किसी सभा या सम्मेलन में -
भाषण देना भी।
पर दोष देखना भी है बहुत सरल,
पर उपदेश भी कुशल बहुतेरे,
कठिन बस केवल –
अपने से अपनी पहचान करानी।
तुम्हारी तो तुम जानो –
मैने जब-जब भी स्वयं को
सत्य की कसौटी पर तोलना चाहा,
स्वयं को स्वयं से ही अजनबी पाया।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

जीवन साथी से

इस ब्लॉग में पिता जी की कुछ बहुत पुरानी रचनाओं को प्रस्तुत करूंगा।
आज की कविता -
लिखने की तिथी 2-9/9/1976

माना आगए हैं आज हम भी वहां
जहां मानवता है और न ही मानव
हमारे चारों ओर ही रचे जा रहे हैं
अनगिनत षडयन्त्र
तभी तो संस्कार नाम की चिड़िया
अपने सुनहरी पंखों सहित उड़ गई है
और हम भी इन जानवरों की भीड़ में
देखा - देखी
कर बैठे हैं सब कुछ विस्मृत
हां एक एहसास सा होता है ---
हम कभी मानव थे
क्या थे कैसे थे छुप गया है
अतीत के गर्भ में
फिर भी आओ
जानवरों की भीड़ से
अलग हटकर
मानव और मानवता की ओर बढ़ें
ठीक ठीक न सही
मानव सी कुछ मिलती जुलती मुर्तियां गढ़ें
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(इसके बाद की चार पंक्तियो पर गोला लगा दिया है .... वे पंक्तियां हैं -
बापू के थे तीन आदर्श बन्दर
हम भी तीनों बच्चों को आदर्श बनाएं
संभव है कल को ये ही कहीं से
ले आएं ढूंढ कर खोई मानवता

शायद इसी लिए यह चित्र खिंचवाया होगा -


बीच में मैं हूं और आसपास दोनों भाई हैं।)